अमर नायक मेहदी ख़लीली
जान गंवाना मेहदी ख़लीली 23 वर्ष में ईरान इस्लामशहर वावान
लेखक: रोझ़ावा
तेहरान में रात के बारह बजे तक तेरी राह तकते रहे, तू नहीं आया यार। मुझमें अब माँ की मुंतज़िर आँखें देखने की ताब नहीं बची, मेरे भाई। ८ जनवरी २०२६ (१८ देय) के आख़िरी पल हैं; ऐसी रात जब सड़कें एक ख़ौफ़नाक वहशत का अखाड़ा बन चुकी हैं; ऐसी नंगी और बेरहम वहशत, जिसकी कल्पना हॉरर साहित्य के लेखकों के भी वहम-ओ-गुमान में बमुश्किल समा सके। रोज़ी-रोटी के संकट के चलते जन-आंदोलन भड़क उठा है और दुकानदारों व बाज़ार वालों ने भी हड़ताल कर दी है। तमाम मुसीबतों से बेज़ार लोग एक बार फिर सड़कों पर उतर आए हैं। इन विरोध-प्रदर्शनों के सिलसिले में, शहज़ादे रज़ा पहलवी ने ईरानियों से अपील की है कि वे ८ और ९ जनवरी २०२६ (१८ और १९ देय १४०४) की रातों को सड़कों पर उतरें या फिर अपने-अपने घरों से नारे बुलंद करके अपने हमवतनों का साथ दें। अब इस आह्वान की पहली रात अपने अंजाम के क़रीब पहुँच रही है। अवाम की भारी मौजूदगी का जवाब ख़ूनी दमन से दिया गया है। जिस भी कूचे और नुक्कड़ से आज़ादी की सदा बुलंद होती है, उसका जवाब सीधी गोलियों से दिया जा रहा है; टोयोटा गाड़ियों पर सजी मशीनगनें शहर भर में तैनात हैं, स्नाइपर भीड़ की निगरानी के लिए ऊँची जगहों पर मोर्चा संभाले बैठे हैं, और सादे कपड़ों में सुरक्षाकर्मी व जवान धारदार और आग्नेयास्त्रों से लैस होकर सड़कों पर मौजूद हैं। अभी मुहर्रम में बहुत वक़्त बाक़ी है, मगर मेरे भीतर एक अज़ीम क…
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