अमर नायक मसऊद फ़क़ीहज़ादा; अगर मैं न जाऊँ…

जान गंवाना मसूद फ़क़ीहज़ादा 36 वर्ष में ईरान इस्फ़हान ख़ाक़ानी

लेखक: साये

जब भी मसूद का नाम लिया जाता, लोग सबसे पहले उसकी दरियादिली की बात करते; एक ऐसा इंसान, जिस पर मुश्किल दिनों में आँख मूँदकर भरोसा किया जा सकता था। उसका जन्म ४ फ़रवरी १९९० (१५ बहमन १३६८) को हुआ था; वह ३६ साल का था और अपनी ३७वीं सालगिरह देखने में बस एक ही महीना बाकी रह गया था। उसने हाल ही में अपना पारंपरिक रेस्तरां शुरू किया था; एक ऐसा ख्वाब, जिसके लिए उसने बरसों मेहनत की थी और जिसका इंतज़ार किया था। दोस्तों और जान-पहचान वालों के बीच वह अपनी शराफ़त और दरियादिली के लिए जाना जाता था। जब भी कोई मुसीबत में फँसता, उसकी राह मसूद तक ही पहुँचती थी। मदद करने में वह कभी नफ़ा-नुकसान या हिसाब-किताब नहीं देखता था; उसका हाथ खुला था और मिज़ाज बेहद सादा और बेतकल्लुफ़। वह इतना सादगी-पसंद था कि उसकी अच्छाइयों का ज़िक्र उसकी अपनी ज़ुबान से कम, और दूसरों की ज़ुबान से ज़्यादा सुनने को मिलता था। वह परिवार का इकलौता बेटा था। पिता के न रहने पर मसूद अपनी अकेली बहन की ज़िंदगी का सबसे बड़ा सहारा बन गया था। ८ जनवरी (१८ देय) की सुबह, उसकी माँ ने उससे बाहर न जाने की इल्तिजा की। उन्होंने कहा कि तुम्हारे सिवा हमारा कौन है? मसूद ने जवाब दिया: «अगर मैं न जाऊँ, तो क्या १६ साल की बच्चियाँ जाएँगी?» ८ जनवरी (१८ देय) को इस्फहान की ख़ाक़ानी सड़क अब महज़ एक सड़क नहीं रह गई थी; वह इंसानों का एक दरिया बन चुकी थी। ऐसे लोग जो कंधे…

مسعود فقیه زاده · اصفهان · باغ رضوان

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