अमर नायक मेहदी जर्राही; शाह अब्दुल अज़ीम के नेकनाम इंसान
जान गंवाना मेहदी जर्राही 47 वर्ष में ईरान شهر ری शाह अब्दुल अज़ीम गोलचक्कर
लेखक: सरवा
मेहदी से इससे कम की उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी। मुहल्ले का हर शख़्स मेहदी को उसकी ग़ैरत, मर्दानगी, बहादुरी और उसूलपरस्ती के लिए जानता था। वह एक ऐसा इंसान था जो ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी के सामने कभी तमाशबीन नहीं बन सकता था, और अगर मुमकिन होता तो किसी दूसरे की हिफ़ाज़त के लिए अपनी जान तक की बाज़ी लगा देता। आख़िरकार, वही जज़्बा और मर्दानगी, जो उसकी पहचान थी, उसकी तक़दीर का फ़ैसला बन गई। जब उसने देखा कि बसीज के कारिंदे एक बेगुनाह लड़की को बुरी तरह मार-पीट रहे हैं, तो वह महज़ दर्शक बनकर न रह सका और बिना किसी झिझक के उसे बचाने के लिए कूद पड़ा; एक ऐसा फ़ैसला, जिसकी क़ीमत उसे अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। मेहदी जर्राही, जिनका जन्म १६ सितंबर १९७८ (२५ शहरिवर १३५७) को हुआ था और जो शहर-ए-रे के बाशिंदे थे, शाह अब्दोल-अज़ीम की दरगाह से गहरा दिली लगाव रखते थे। जब कभी उन्हें मौक़ा मिलता, वह दरगाह के सेहन का रुख़ करते; सिर्फ़ ज़ियारत के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी जवानी के दिनों की यादों को ताज़ा करने के लिए भी। उनका यह दस्तूर था कि जब भी शाह अब्दोल-अज़ीम जाते, अपना मोबाइल निकालते और दरगाह के उस पुरसुकून माहौल का एक वीडियो बनाकर परदेस में बैठे अपने दोस्तों को भेजते, ताकि वे भी उस पाकीज़ा लम्हे की रूहानियत में शरीक हो सकें और गुज़रे ज़माने की यादें मिलकर ताज़ा कर सकें। वह अपना स्वतंत्र काम-धंधा करते थे और अवा…
مهدی جراحی · تهران شهر ری · شاه عبدالعظیم