جاویدنام مجید رضوانیفر؛ از رنج معیشت تا دغدغه آزادی
जान गंवाना मजीद रेज़वानीफ़र 45 वर्ष में ईरान लंगरूद میدان فرمانداری
लेखक: सफ़र
मजीद रिज़वानीफ़र एक बेहद मेहनती पिता थे; उन इंसानों में से एक, जो अपनी सारी थकान घर की चौखट के बाहर ही छोड़ आते थे ताकि ज़िंदगी की फ़िक्रें घर के भीतर दाखिल न हो सकें। उनकी पूरी कोशिश यही रहती कि उनके परिवार और उनके प्यारे बच्चे के हिस्से में ज़िंदगी थोड़ी और पुरसुकून और रोशन आए। उन्होंने बारहवीं तक पढ़ाई की थी और उनका अपना स्वतंत्र काम-धंधा था। मजीद वर्ष २०२२ (१४०१) में सड़कों पर और अवाम के बीच जो कुछ घट रहा था, उससे अपनी आँखें नहीं मूँद सके थे। उनका ज़मीर उन्हें चुप रहने का आसान रास्ता चुनने की इजाज़त नहीं देता था। तीन साल बाद, जब लोगों के कंधों पर ज़िंदगी का बोझ और भी भारी हो गया, तो वे इस दर्द को अपने चारों तरफ़ पहले से कहीं ज़्यादा महसूस कर रहे थे; उन लोगों की ज़िंदगी में, जो गुज़र-बसर के लिए रोज़मर्रा की मुश्किलों से जूझ रहे थे। समाज के कमज़ोर तबके की फ़िक्र उनका पीछा नहीं छोड़ती थी और लोग जिस बदहाली में घिरे थे, उससे वे भीतर तक व्यथित थे। मजीद के लिए लोगों की तकलीफ़ सिर्फ़ सिकुड़ती दस्तरख़ानों और तंग होती ज़िंदगी तक ही सीमित नहीं थी; वे आज़ादी के अभाव को भी इसी दर्द का एक हिस्सा मानते थे। इन्हीं तमाम चिंताओं, इंसानियत के जज़्बे और सामाजिक ज़िम्मेदारी के अहसास ने ९ जनवरी (१९ दे) की शाम उन्हें सड़कों पर खींच लिया। उस रात, घर उनके लिए सबसे महफ़ूज़ पनाहगाह हो सकता था; वह जगह जहा…
مجید رضوانیفر · لنگرود