ज़हरा (सपीदेह) अहमदवंद; वह माँ, जिसकी सच्चाई को भी उन्होंने मार डाला
जान गंवाना ज़हरा(सेपिदेह) अहमदवंद 40 वर्ष में ईरान करज अज़ीमिए
लेखक: नारीना
कमरे में अब भी उनकी खुशबू बसी है। तकिये पर एक हल्की सी महक ठहरी हुई है, गोया कल ही किसी ने उस पर अपना सिर रखा हो। खिड़की के पास रखी कुर्सी पर एक लिबास पड़ा है, जिसकी सिलवटों में अब भी उनके जिस्म का सांचा महफ़ूज़ है। उनका ९ साल का बेटा कभी-कभार कमरे में आता है, आहिस्ता से दरवाज़ा बंद करता है और उसी कुर्सी पर बैठ जाता है। वह कुछ नहीं बोलता। बस अपनी उंगलियों के पोरों से उस लिबास को छूता है, फिर उठता है और चला जाता है। उनके पति इस कमरे में कम ही क़दम रखते हैं। जब आते भी हैं, तो खिड़की के पास खड़े होकर सड़क को एकटक ताकते रहते हैं। वह खुद घर में किसी ज़िंदा लाश की तरह घूमते हैं; उन्हें सूझता नहीं कि क्या करें, और लगता है जैसे अब वह इस दुनिया के रहे ही नहीं। सेपिदेह (ज़हरा) अहमदवंद ४० वर्ष की थीं और करज के अज़ीमीए की रहने वाली थीं। जानने वाले उन्हें एक बेहद रहमदिल, शांत और उम्मीदों से भरी ख़ातून बताते हैं; एक ऐसी फ़दाकार माँ, जिसने अपना पूरा वजूद अपने बच्चे पर न्योछावर कर दिया था। वह ८ जनवरी (१८ देह) की रात अज़ीमीए चौक पर गईं। जैसे ही वह गाड़ी से उतरीं और चंद क़दम आगे बढ़ीं, एक इमारत की छत से, पीछे से आकर उनके सिर में गोली लगी। उनकी मौत के दो बिल्कुल उलट बयान हैं। हुकूमत का थोपा हुआ दावा यह था कि आम लोगों ने लाठी से सिर पर वार करके उनकी जान ली। सुरक्षा अधिकारियों ने धमकियों और भारी ज़हनी…
سپیده احمدوند · کرج · مادر · عظیمیه