جاویدنام حسین جوزقیان

जान गंवाना हुसैन जौज़क़ियान 32 वर्ष में ईरान इस्फ़हान نجف‌آباد

लेखक: रूदाबेह

इसफ़हान के नजफ़ाबाद के रहने वाले सर्राफ़ हुसैन जोज़क़ियान की दुकान शुरू हुए अभी कुछ ही वक़्त गुज़रा था, जब ९ जनवरी २०२६ (१९ दी १४०४) की शाम, देशव्यापी विरोध-प्रदर्शनों की दूसरी रात, शहर के पुलिस थाने के सामने सरकारी सुरक्षा बलों की सीधी गोलीबारी में उनकी जान चली गई। उनकी उम्र महज़ ३२ वर्ष थी; एक ऐसे नौजवान जिन्होंने अभी-अभी अपने भविष्य की बुनियाद रखी ही थी, मगर उस मुस्तक़बिल में उनके हिस्से बहुत कम वक़्त लिखा था। हुसैन के जाने के बाद, जब परिवार उनके अंतिम संस्कार की तैयारियों में जुटा था, तो उनके कमरे से एक हस्तलिखित पत्र मिला; एक ऐसी तहरीर, मानो उन्होंने पहले से ही उन दिनों की याद के तौर पर संजो रखी हो। परिजनों ने उसे उनके पार्थिव शरीर के साथ ही सुपुर्द-ए-ख़ाक कर दिया। वह एक ऐसा नोट था जिसकी शुरुआत इन शब्दों से होती थी: «तू मेरी सरज़मीन है, तू ही मुझे पहचान देती है; जो तुझसे प्रेम नहीं करता, वह बेवतन है।» ये चंद शब्द, किसी भी विस्तृत व्याख्या से बढ़कर, ईरान के साथ उनके गहरे रिश्ते को उजागर करते थे; वह सरज़मीन जिसे वे टूटकर चाहते थे और आख़िरकार उसी की राह में अपनी जान भी न्योछावर कर दी। उसी हस्तलेख में आगे लिखा था: «तेरी ही मोहब्बत के सहारे मैं जुड़ता हूँ; ईश्वर से, ज़मीन से, इतिहास और वक़्त से... पानी से, पत्तों से, बच्चों से जब वे मुस्कुराते हैं, रोटी से, समंदर से, सीपियों और कश्…

حسین جوزقیان · اصفهان · نجف‌آباد · روبروی کلانتری

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