अमर नायक रसूल क़ल्यानी; मर्द का जौहर उसके काम में है
जान गंवाना रसूल क़ल्यानी 37 वर्ष में ईरान करज मोहम्मद शहर
लेखक: महताब
वह बच्चा, जो किसी रात आसमान के उस चमकते बिंदु को अपना पिता समझता था, आज चार साल का महदियार है, जो अपने बचपन के दिनों में उस पिता की याद में तड़प रहा है जो अब इस दुनिया में नहीं है; एक ऐसा पिता, जो किसी भी चीज़ से बढ़कर, उसकी ज़िंदगी में हमेशा मौजूद रहने वाला खालीपन बन चुका है। रसूल ग़लियानी ने २२ जून १९८८ (१ तीर १३۶۷) को, तपती गर्मियों के चरम पर, अपने जन्म के महीने की धूप जैसा गर्म दिल लिए इस दुनिया में आँखें खोलीं। तीर का महीना और तीर का ही निशाँ; मानो क़िस्मत ने शुरू से ही इस महीने के पंचांग में उसका नाम लिख दिया था। जैसे तय था कि वह ख़ुद भी एक तीर बनेगा; ज़माने की कमान से छूटा हुआ एक ऐसा तीर, जो बरसों और मुश्किलों के पार निकल गया और इस सरज़मीं के सीने पर और इसके लोगों की यादों में अपने होने का निशाँ हमेशा के लिए छोड़ गया। वह महज़ तीर के महीने में पैदा नहीं हुआ था; वह तो ख़ुद धूप से तराशा हुआ एक तीर बन गया, चट्टान सी अडिगता से गढ़ा हुआ, और उन मर्दों जैसा जिनका इस दुनिया से गुज़रना महज़ एक याद से कहीं बढ़कर कुछ छोड़ जाता है। उसकी कामकाजी ज़िंदगी करज की फल-सब्ज़ी मंडी से शुरू हुई; मज़दूरी और हाड़-तोड़ मेहनत से, उन्हीं दिनों से जब उसने अपनी ज़िंदगी को अपने ही हाथों गढ़ा था। वह क़दम-दर-क़दम और बेपनाह जद्दोजहद के साथ अपनी राह पर आगे बढ़ता गया, और बाद में करज के कई बड़े बाज़ारों में स्…
رسول قلیانی · نراتا · کرج · محمدشهر