अमर नायक अली मिर्ज़ाई

जान गंवाना अली मिर्ज़ाई 23 वर्ष में ईरान तेहरान नारमक

लेखक: मेहरशीद

अली मिर्ज़ाई, २३ वर्ष के, परिवार के इकलौते बेटे थे और उनकी एक बहन थी। वह अराक औद्योगिक विश्वविद्यालय में खनन इंजीनियरिंग में स्नातकोत्तर के छात्र थे और अपनी पढ़ाई पूरी संजीदगी से कर रहे थे। मगर मुस्तक़बिल के लिए वह सिर्फ़ इंजीनियरिंग के बारे में ही नहीं सोचते थे; उन्हें कारोबार का गहरा शौक़ था और दिली ख़्वाहिश थी कि किसी दिन उनका अपना एक सोफ़्रेह-ख़ाना (पारंपरिक रेस्तरां) हो। अपने कमरे में भी उन्होंने सोफ़्रेह-ख़ानों के अंदाज़ में गाव-तकियों और मसनदों से सजा एक तख़्त बिछा रखा था और तरह-तरह के हुक्कों का एक ख़ूबसूरत संग्रह भी सहेज रखा था। अली बेहद दयालु, बामुरव्वत और ऊर्जा से लबरेज़ इंसान थे; परिवार से गहरा लगाव रखने वाले, मेहमाननवाज़ और महफ़िलों व मेल-जोल के शौक़ीन। वह दूसरों के साथ बहुत जल्द घुल-मिल जाते थे और पढ़ाई के साथ-साथ दोस्तों और अज़ीज़ों के साथ वक़्त बिताने के लिए हमेशा समय निकालते थे। परिवार और दोस्तों के बीच वह हँसी-मज़ाक करते, खिलखिलाते, नाचते और अपने ज़बरदस्त जोश व उमंग से पूरी महफ़िल में जान फूँक देते थे। जनवरी २०२६ (दी १४०४) में, बदहाल आर्थिक हालात के ख़िलाफ़ तेहरान के बाज़ार से फूटा जन-आक्रोश तेज़ी से ईरान के विभिन्न शहरों में फैल गया। ८ जनवरी २०२६ (१८ दी १४०४) की शाम, शहज़ादे रज़ा पहलवी के आह्वान पर, हफ़्त-हौज़ चौराहे के इलाक़े सहित तेहरान के नारमक मोहल्ले में लोग…

علی میرزایی · دانشجو · تهران · نارمک

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