अमर नायक मरियम इब्राहिमज़ादेह; मिट्टी और रंगों का एक सरू
जान गंवाना मरियम इब्राहिमज़ादेह 45 वर्ष में ईरान तेहरान ज़ीबाशहर
लेखक: रोशना
मरियम मिट्टी के मिज़ाज से वाक़िफ़ थी; वह मिट्टी जो उसकी उँगलियों के पोरों तले नर्म पड़ जाती, आकार लेती और भट्टी की तपिश में रंग-ओ-नक़्श से सजे एक पात्र में ढल जाती। वह चीनी मिट्टी और मृद्भांड बनाती और गहनों की रूपरेखा गढ़ती थी; मिट्टी और धातु से वह नाज़ुक और अमर कृतियाँ रचती थी। शायद इसीलिए उसके चले जाने के बाद, उसके परिवार और दोस्तों ने उसकी याद के लिए सरू के दरख़्त को चुना—एक ऐसा दरख़्त जिसकी जड़ें मिट्टी में गहरी हैं और कद आसमान की ओर उठा हुआ है; हरियाली, अडिगता और एक ऐसे नाम की निशानी जो कभी गुमनामी के गर्त में समाने वाला नहीं था। मरियम इब्राहिमज़ादेह, १९८० (१३५९) में जन्मी और एक १४ वर्षीय बेटे की माँ, ज़िंदगी को अपने हाथों की नज़ाकत और नज़र की गहराई से संवारती थी। वह मिट्टी, रंग और धातु के साथ काम करती थी; मिट्टी और सिरेमिक को अपनी उँगलियों से रूप देती और कच्ची चीज़ों से नफ़ीस ज़ेवरात तराशती थी। उसके इंस्टाग्राम के पन्ने पर आज भी उस कलात्मक दृष्टि की छाप बाक़ी है: वे नक़्श, रंग और आकृतियाँ जो एक संवेदनशील ज़ेहन और हुस्न-शनास हाथों की दास्तान सुनाते हैं। उसके दोस्त उसे एक बेहद ख़ुश-ज़ौक़ और सलीक़ामंद औरत के तौर पर जानते थे; एक ऐसी इंसान जो किसी बेजान, कच्ची चीज़ से एक यादगार कृति निकाल लाती थी। शायद सृजन के इसी रिश्ते ने उसके आसपास के दर्दों के प्रति उसकी नज़र को और भी पैना कर द…
مریم ابراهیمزاده · سرامیک · سرو · تربتحیدریه