अमर नायक सुग़रा हातमी
जान गंवाना सोग़रा हातममी 73 वर्ष में ईरान करज फ़र्दीस
लेखक: मेहरशीद
उस रात लोग बदलाव की उम्मीद लिए सड़कों पर उतर आए थे; एक ऐसी उम्मीद, जिसके सीने में ख़तरे का एहसास भी छुपा था। वे जानते थे कि उनकी राह में हिंसा से सामना हो सकता है, फिर भी उनके क़दम पीछे नहीं हटे थे। विरोध-प्रदर्शन, जो २८ दिसंबर २०२५ (७ दे १४०४) को तेहरान के बाज़ार से आर्थिक असंतोष के साथ शुरू हुए थे, पूरे देश में फैल चुके थे। शहज़ादे रज़ा पहलवी के आह्वान पर ८ और ९ जनवरी २०२६ (१८ और १९ दे) की रातों में भारी तादाद में लोग सड़कों पर उतर आए। फ़र्दीस भी इन दो रातों में प्रदर्शनकारियों की भारी मौजूदगी और हुकूमत की फ़ौजों की गोलीबारी का गवाह बना। मगर उस रात फ़र्दीस सिर्फ़ एक शहर नहीं रह गया था; वह उन इंसानों का मंच बन चुका था, जिनमें से हर कोई अपने दिल में एक छोटी मगर पक्की उम्मीद लिए आया था, ताकि सब मिलकर एक बड़े बदलाव की इबारत लिख सकें। उसी भीड़ के दरमियान शीराज़ की रहने वाली सुग़रा हातेमी भी मौजूद थीं; ७३ साल की एक माँ, जिन्होंने क़रीब तीस बरस अकेले ही अपने बच्चों को पाला-पोसा था। अज़ीज़ों का कहना है कि वह एक बेहद मेहरबान और हमदर्द ख़ातून थीं, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा अपने परिवार पर न्योछावर कर दिया था। इसके बावजूद, जब विरोध-प्रदर्शन शुरू हुए, तो उन्होंने महज़ तमाशबीन बने रहना गवारा नहीं किया; तिहत्तर साल की उम्र में भी शहर की सड़कों पर जो कुछ गुज़र रहा था, उससे वह ख़ुद को…
صغری حاتمی · سالمند · فردیس · کرج